मुंबई [ इंटरनेट डेस्क ] हाई कोर्ट ने 22 साल पुराने कत्ल के एक मामले में सत्र अदालत से आजीवन कारावास की सजा पाए एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने आरोपी द्वारा गवाह के समक्ष न्यायेतर अपराध स्वीकारोक्ति को सुबूत मानने से इन्कार कर दिया।
न्यायमूर्ति ए.एस ओका और एस.एस जाधव की पीठ ने अभियोजन पक्ष के गवाह सुभाष भोइर के समक्ष आरोपी चंद्रकांत सालुंके की अपराध-स्वीकरोक्ति पर विचार करने से इन्कार कर दिया। भोइर ने अपने बयान में कहा था कि सालुंके ने उसे बताया था कि उसने जाती दुश्मनी के चलते पंधारी पंधारकर की हत्या कर दी है। अभियोजन के मुताबिक सालुंके ने अक्टूबर, 1990 में पुणे की एक सड़क पर तलवार से हमलाकर पंधारकर को बुरी तरह घायल कर दिया था। घटना के तुरंत बाद सालुंके हाथ में तलवार लिए भोइर को मिला था। भोइर ने उसके हाथ से तलवार छीन ली थी। बाद में दोनों पीड़ित को नजदीकी अस्पताल ले गए थे, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया था। हाई कोर्ट पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘पूरा मामला भोइर के समक्ष कथित तौर पर आरोपी की न्यायेतर अपराध स्वीकारोक्ति पर टिका है। यह कमजोर सुबूत है।
गवाह ने खुद कहा है कि अपराध स्वीकारोक्ति के समय आरोपी नशे में था। इन परिस्थितियों में अपराध स्वीकारोक्ति पर विचार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह पूरी तरह रहस्यमय है।’

