ठाकरे के स्मारक पर राजनीति

मुंबई [ इंटरनेट डेस्क ] बालासाहेब की मौत के बाद उनके स्मारक को लेकर राजनीति गरमा गई है। मराठा वोट बैंक की राजनीति कर रही पार्टियों में स्मारक को लेकर गहरा मतभेद सामने आया है। शिवसेना: जहां तक शिवसेना का सवाल है, उनके लिए बालासाहेब के स्मारक के लिए शिवाजी पार्क ही सबसे मुफीद जगह होनी चाहिए। अस्थियां हटाने के बाद उस स्थान पर जिस तरह यहां रोजाना फूलों की सजावट की जा रही है और दर्शनार्थियों का सिलसिला लगा हुआ है, उसके बाद इसमें शक की गुंजाइश नहीं रह जाती।

बालासाहेब के बाद शिवसेना के ‘सर्वेसर्वा’ उद्धव ठाकरे के रोक लगाने से पहले उनकी पार्टी के लगभग सभी प्रमुख नेता इसकी मांग कर चुके हैं। 16 एकड़ में फैले विशाल मैदान की दूसरी तरफ बालासाहेब की पत्नी मीनाताई की अर्ध प्रतिमा पहले ही स्थापित है। टेंपरेरी स्मारक तो बन ही चुका, इसे हटाने के झंझट में कोई पडे़गा, ऐसा नहीं लगता। मनसे: राज ठाकरे की पार्टी ‘मनसे’ शिवाजी पार्क इलाके में शिवसेना को पिछाड़कर सबसे पॉप्युलर पार्टी के तौर पर उभरी है। उसके परोक्ष समर्थन के बिना शिवसेना के मुकाबले खड़े होना शिवाजी पार्क के स्थानीय नागरिक संगठनों के लिए आसान नहीं होगा। मंगलवार को नागरिक संगठनों की ओर से मैदान बचाने के पक्ष में स्वर बुलंद भी हुआ। अजित वाडेकर, सुनील गावस्कर और सचिन तेंडुलकर जैसे भारतीय क्रिकेट के दिग्गज कप्तानों के अखाड़े के तौर पर पहचाने जाने वाले मैदान को बख्श दिया जाना चाहिए। राज इससे पहले भी इंदु मिल की पूरी साढ़े चार एकड़ जमीन पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का स्मारक बनाए जाने का विरोध कर चुके हैं। वे वहां लाइब्रेरी बनाने का सुझाव दे ही चुके हैं। वैसे, बालासाहेब के स्मारक को लेकर अभी राज कुछ नहीं बोले हैं।

रिपब्लिकन: रिपब्लिकन पार्टी के अध्यक्ष रामदास आठवले जब से शिवसेना-बीजेपी के साथ आए हैं, राज ठाकरे की पार्टी को इस गठबंधन शामिल किए जाने का विरोध कर रहे हैं। राज द्वारा डॉ. आंबेडकर के स्मारक की जगह लाइब्रेरी बनाने का प्रस्ताव के बाद उनका रुख और कठोर हो गया है। जाहिर हैं, वे बेचैन हो गए हैं। इंदु मिल की जमीन केंद्र से अधिगृहित करने की मांग को लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को उन्हें आगाह भी किया। इंदु मिल का मसला एक तरह से उनके अस्तित्व के साथ जुड़ा है। इसकी संभावना कम है, मगर शिवसेना अगर इंदु मिल में स्मारक की बात मान लेती है, तो शिवसेना-बीजेपी ‘महायुति’ छोड़ने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा।

कांग्रेस : सत्तारूढ़ कांग्रेस – एनसीपी सरकार इस मामले को लेकर किसी तरह की जल्दबाजी करेगी , इसकी संभावना कम ही है। साल भर में यही तय नहीं हो पाया कि इंदु मिल खरीदने के लिए महाराष्ट्र सरकार एनटीसी को कितने पैसे का मुआवजा चुकाएगी। जमा – नुकसान का राजनीतिक अंकगणित तो यही बताता है कि शिवसेना , मनसे और रिपब्लिकन पार्टी को आपस में मामला आपस में उलझकर सलटाने के लिए छोड़ देना चाहिए। लेकिन 2014 के लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अब दूर नहीं। कांग्रेस के पास ठोस मराठा वोट बैंक है। इसके अलावा डॉ . आंबेडकर प्रेमी दलित वोट बैंक को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। कांग्रेस के मंत्री यही बोल रहे हैं।

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