मुंबई [ NI 24 ] सीनियर अभिनेता ए. के. हंगल का रविवार सुबह बीमारी के बाद मुंबई के एक हॉस्पिटल में निधन हो गया। उन्हें ‘नमक हराम’, ‘शोले’ और ‘शौकीन’ में उनके बेहतर अभिनय के लिए याद किया जाता है। वह 95 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्कार सोमवार दोपहर एक बजे होगा।
हंगल के बेट विजय ने कहा, ‘सुबह 9 बजे आशा पारेख अस्पताल में उनका निधन हुआ। कुछ समय से उनकी तबियत ठीक नहीं थी।’ उन्होंने कहा, ‘शुरू में वह वेंटिलेटर थे लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था इसलिए डॉक्टरों ने उन्हें वेंटिलेटर से हटाने का फैसला किया।13 अगस्त को बाथरूम में फिसलकर गिर जाने और कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण उन्हें 16 अगस्त को सांताक्रूज स्थित हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। पिछले कुछ सालों से वह हॉस्पिटल का बराबर चक्कर लगा रहे थे। वह हाई ब्लडप्रेशर और किडनी सहित कई बीमारियों से परेशान थे। उनका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने पहले उनकी टूटी हड्डी का ऑपरेशन करने के बारे में सोचा था, लेकिन उनकी उम्र को देखते हुए ऑपरेशन नहीं किया गया। उनके बेटे ने कहा, ‘मेरे पिता उत्साही व्यक्ति थे। अंतिम सांस तक हर समय वह संघर्ष करते रहे।’ पिछले वर्ष उनका तबियत खराब होने और आर्थिक स्थिति बिगड़ने की खबर आने के बाद फिल्म इंडस्ट्री की कई हस्तियों ने उनका सहयोग किया।
अभिनेता बनने से पहले हंगल स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रहे थे। उन्होंने ‘शोले’, ‘शौकीन’, ‘नमक हराम’, ‘आईना’, ‘अवतार’, ‘अर्जुन’, ‘आंधी’, ‘कोरा कागज’, ‘बावर्ची’, ‘चितचोर’, ‘गुड्डी’, ‘अभिमान’, ‘अनामिका’ और ‘परिचय’ सहित कई फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाईं। राजेश खन्ना अभिनीत ‘आप की कसम’, ‘अमर दीप’, ‘नौकरी’, ‘थोड़ी सी बेवफाई’ और ‘फिर वही रात’ में भी वे नजर आए। टीवी सीरियल ‘मधुबाला’ के लिए सात सालों के अंतराल पर वह हाल में स्टूडियो लौटे थे।
हंगल साहब के फ़िल्मी केरियर की शुरुआत बासु भट्टाचार्य निर्देशित 1966 में बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ से हुई ! रंगमंच पर हंगल के एक्टिंग से प्रभावित होकर मशहूर डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी ने उन्हें अपनी फिल्मों में मौका दिया। ‘शोले’ में अंधे ‘इमाम साहब’ का किरदार और उनके डायलॉग ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई’ को कौन भूल सकता है। ‘शौकीन’ के रंगमिजाज बुजुर्ग इंदरसेन उर्फ एंडरसन के रोल में हंगल बेमिसाल थे। अवतार, शौकीन, गुड्डी, नमक हराम, बावर्ची, अर्जुन, शौकीन, 7 हिंदुस्तानी में अपनी एक्टिंग से अलग पहचान बनाने वाले हंगल ने 45 साल लंबे करियर में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। हाल के सालों में हंगल साहब लगान, ये दिल मांगे मोर जैसी फिल्मों में दिखे। अमोल पालेकर निर्देशित पहेली (2005) हंगल साहब की आखिरी फिल्म थी। साल 2006 में हंगल को पद्म विभूषण दिया गया।
मुफलिसी में गुजरा आखिरी वक्त
अभिनेता हंगल ने 74 साल के बेटे विजय ने बताया था कि किडनी और अस्थमा की बीमारियों से जूझ रहे हंगल की दवाएं बहुत महंगी थीं। उनके अस्पताल और अटेंडेंट का खर्च भी इतना ज्यादा था कि जिसे मैं अपनी 15 हजार रुपये महीने की पगार में पूरा नहीं कर सकता।

